राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के भारत दौरे के दौरान डिफेंस डील्स को लेकर चर्चा ज़ोरों पर है। आज सुबह से ही सोशल मीडिया और न्यूज़ चैनलों पर S-500 ‘प्रोमेथियस’ सिस्टम के बारे में खबरें चल रही हैं। ट्विटर पर #S500India और #PutinModiDeal ट्रेंड कर रहे हैं, जहाँ यूज़र्स ‘ऑपरेशन सिंदूर’ में S-400 की सफलता के बाद S-500 को ‘गेम-चेंजर’ कह रहे हैं।

आज तक को दिए इंटरव्यू में पुतिन ने कहा कि भारत हमारा भरोसेमंद पार्टनर है। S-500 का जॉइंट प्रोडक्शन मुमकिन है। आइए समझते हैं – क्या S-500 भारत में बनेगा? और यह S-400 से कितना आगे है?
S-400 की सफलता ने S-500 का रास्ता क्यों बनाया?
ऑपरेशन सिंदूर में, S-400 ने 95% पाकिस्तानी ड्रोन और मिसाइलों को नष्ट कर दिया था। पंजाब के आदमपुर एयरबेस पर तैनात S-400 ने बिना किसी नुकसान के 400 km दूर के टारगेट को ट्रैक किया। पाकिस्तान ने दावा किया कि उसके JF-17 जेट ने S-400 को नष्ट कर दिया, लेकिन भारत सरकार ने इसे झूठा प्रोपेगैंडा बताकर खारिज कर दिया।
क्या S-500 भारत में बनेगा? जॉइंट प्रोडक्शन की पूरी जानकारी

हां, इसकी संभावना बहुत ज़्यादा है। रूस की अल्माज़-एंटे कंपनी भारत की BEL (भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड) और BDL (भारत डायनेमिक्स लिमिटेड) के साथ पार्टनरशिप करना चाह रही है। इससे मेक इन इंडिया को बड़ा बढ़ावा मिलेगा – रडार, इंटरसेप्टर मिसाइल और कमांड सिस्टम भारत में ही बनाए जाएंगे।
- प्रोडक्शन प्लान: नासिक या हैदराबाद में फैक्ट्री सेटअप, पहली यूनिट 2028 तक डिलीवर होगी। भारत को 60% ToT के साथ हाइपरसोनिक टेक मिलेगी।
- जॉइंट क्यों? S-400 की तरह डायरेक्ट खरीद नहीं, बल्कि ब्रह्मोस मिसाइल की तरह एक JV (जॉइंट वेंचर)। रूस को मार्केट मिलेगा, भारत को नौकरियां (हजारों हाई-स्किल्ड लोग) और एक्सपोर्ट के मौके मिलेंगे।
- चुनौतियां: US CAATSA सेंक्शन का डर। लेकिन S-400 के बावजूद भारत को कोई पेनल्टी नहीं लगी।
S-500 बनाम S-400: आसान शब्दों में पूरी तुलना
S-400 एक थिएटर-लेवल सिस्टम है जो 2007 से चल रहा है, जिसका मतलब है कि यह किसी खास एरिया या बॉर्डर की एयर डिफेंस करता है। S-500 एक नेशनल-लेवल सिस्टम है जो 2021 से रूस में तैनात है, जो पूरे देश और यहां तक कि स्पेस की भी सुरक्षा करता है।

- रेंज… रेंज की बात करें तो, S-400 400 किलोमीटर तक के हवाई टारगेट को मार सकता है, जबकि S-500 600 किलोमीटर तक की बैलिस्टिक मिसाइलों को नष्ट कर सकता है – यह 50% ज़्यादा रेंज है, जिससे दूर के खतरों का पहले पता लगाया जा सकता है।
- ऊंचाई… ऊंचाई में काफ़ी अंतर है। S-400 ज़्यादा से ज़्यादा 30 किलोमीटर दूर टारगेट (आम लड़ाकू विमान) को मार सकता है, लेकिन S-500 200 किलोमीटर की ऊंचाई तक पहुंच सकता है – इसका मतलब है कि यह नियर-स्पेस और लो-अर्थ ऑर्बिट में सैटेलाइट को भी नष्ट कर सकता है। पैसेंजर प्लेन 10-12 किलोमीटर की ऊंचाई पर उड़ते हैं, जबकि S-500 20 गुना ज़्यादा ऊंचाई तक का पता लगा सकता है।
- स्पीड… स्पीड हैंडलिंग के मामले में, S-400 लगभग 17,000 km/h तक की स्पीड से चलने वाली मिसाइलों को इंटरसेप्ट कर सकता है, लेकिन S-500 लगभग 25,000 km/h तक की स्पीड से चलने वाली हाइपरसोनिक मिसाइलों को भी इंटरसेप्ट कर सकता है – यह काम S-400 नहीं कर सकता।
- टारगेट… यह एक साथ कितने टारगेट हैंडल कर सकता है? S-400 एक साथ 80 टारगेट को ट्रैक कर सकता है और 36 पर हमला कर सकता है। S-500 एक साथ 100 से ज़्यादा टारगेट को ट्रैक कर सकता है और स्टील्थ जेट (F-35, J-20), ड्रोन, क्रूज़ मिसाइल, बैलिस्टिक मिसाइल और यहाँ तक कि स्पेस ऑब्जेक्ट को भी टारगेट कर सकता है।
- रडार… रडार टेक्नोलॉजी के मामले में, S-500 में GaN-बेस्ड रडार हैं, जो ज़्यादा रेंज, तेज़ ट्रैकिंग और जैमिंग रेजिस्टेंस देते हैं। एक यूनिट में 12 लॉन्चर होते हैं, जबकि S-400 में ये कैपेबिलिटी कम हैं।

- रिस्पॉन्स टाइम… रिस्पॉन्स टाइम का मतलब है, किसी खतरे का पता चलने के बाद मिसाइल लॉन्च करने में लगने वाला समय। S-400 को 10 सेकंड लगते हैं, जबकि S-500 सिर्फ़ 4 सेकंड में रिएक्ट करेगा—ढाई गुना तेज़।
- मिसाइल… मिसाइलों के टाइप भी अलग-अलग होते हैं। S-400 में 40N6 और 9M96 जैसी मिसाइलें हैं, जो मुख्य रूप से एयरक्राफ्ट और क्रूज़ मिसाइलों के लिए हैं। S-500 में 77N6-N सीरीज़ की हिट-टू-किल मिसाइलें हैं, जो सीधे हिट से हाइपरसोनिक ग्लाइड हथियारों को भी खत्म कर सकती हैं।
- कीमत… S-400 की एक रेजिमेंट की कीमत लगभग $500 मिलियन है (5 रेजिमेंट के लिए कुल डील $5.43 बिलियन थी), जबकि S-500 की एक यूनिट की कीमत $700 मिलियन से $2.5 बिलियन तक हो सकती है—महंगी, लेकिन यह एक नेशनल एसेट की तरह है।
- मोबिलिटी… हालांकि दोनों सिस्टम ट्रक पर लगे होते हैं, S-500 का सेटअप और रडार सिस्टम ज़्यादा एडवांस्ड है – सिर्फ़ चार गाड़ियां एक पूरा रडार सेट ले जाती हैं और इसे तेज़ी से कहीं भी तैनात किया जा सकता है।
S-400 एक मज़बूत रीजनल शील्ड है (जैसे पंजाब या लद्दाख बॉर्डर को कवर करना), जबकि S-500 एक पूरा नेशनल किला है – जो दिल्ली, मुंबई और बैंगलोर जैसे शहरों के साथ-साथ स्पेस की भी सुरक्षा करता है। S-500, S-400 की जगह नहीं लेगा, बल्कि उसके ऊपर एक मज़बूत लेयर जोड़ेगा – इसे मल्टी-लेवल कहा जाता है।


